"29 मई की वो रात मेरे जीवन की सबसे काली रात थी. पुलिस मुझे देर शाम क़रीब 8 बजे ग्वालपाड़ा डिटेंशन सेंटर
लेकर पहुंची थी. जेल के अंदर क़दम रखते ही मेरा बदन कांपने लगा था. मैं
फ़ौजी हूं लेकिन मेरे सामने जो हालात थे उससे मैं टूट चुका था."
"मेरी
आंखों के सामने फ़ौज में गर्व से काटे वो दिन बार-बार याद आ रहे थे. मैं सोच नहीं पा रहा था मैंने क्या ग़लती कर दी और मुझे जेल में डाल दिया गया.
मेरा ब्लड प्रेशर हाई हो गया था. मैं उस रात बहुत रोया."भारतीय सेना में 30 साल सेवा देने वाले रिटायर्ड सूबेदार मोहम्मद सनाउल्लाह डिटेंशन सेंटर में गुज़ारे अपने अनुभव को साझा करते हुए मायूस हो जाते हैं.
दरअसल, कामरूप ग्रामीण ज़िले की एक फॉरनर्स ट्राइब्यूनल (एफ़टी) अदालत ने बीते 23 मई को रिटायर्ड फ़ौजी सनाउल्लाह को विदेशी नागरिक घोषित कर दिया था.
इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर 29 मई को ग्वालापाड़ा जेल के अंदर बने डिटेंशन सेंटर में भेज दिया गया. कुल 11 दिन जेल में काटने के बाद गुवाहाटी हाई कोर्ट से मिली अंतरिम ज़मानत पर आठ जून को सनाउल्लाह बाहर निकले हैं.
52 साल के मोहम्मद सनाउल्लाह ने बीबीसी से कहा, "ग्वालपाड़ा जेल में मुझे रूम नंबर तीन में रखा गया. जेल में विदेशी नागरिकों के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है. मेरे सेल में दूसरे क़ैदी भी थे. ऐसी स्थिति का सामना जीवन में कभी नहीं हुआ था. मैने 30 साल तक देश की सेवा की और मुझे ऐसे दिन देखने पड़ रहे थे. जेल के भीतर एक अलग दुनिया थी. मैं चाह कर भी ख़ुद को उस स्थिति से निकाल नहीं पा रहा था."
"दो दिन तक मैंने जेल में किसी से कोई बात नहीं की. केवल अपने बारे में, परिवार के बारे में सोचता रहा. इन दो-तीन दिनों में मेरा शरीर काफ़ी कमज़ोर हो गया था. मेडिकल चेकअप भी करवाया. मैंने फ़ौज के दिनों को याद किया और उससे मुझे ताक़त मिली. सेना में हमें हर मुसीबत का सामना करना सिखाया जाता है. मैंने सीमा पर बहादुरी से खड़े होकर अपने देश का बचाव किया है. इसलिए हार नहीं मानूंगा. मैं भारतीय हूं और अपने देश में ही रहूंगा. मुझे यक़ीन है कि इस क़ानूनी लड़ाई में मेरे साथ न्याय होगा."
ग्वालपाड़ा डिटेंशन सेंटर में क़ैद विदेशी नागरिकों का ज़िक्र करते हुए सनाउल्लाह कहते है, "40 फुट के कमरे में क़रीब 45 कैदियों के साथ मुझे रखा गया था. शाम छह बजे ही हम सबको रूम में बंद कर दिया जाता था. ज़मीन में एक पतला-सा कंबल बिछाकर सोना पड़ता था, वो शरीर में काफ़ी चुभता था. दिन में मैं कुछ ऐसे क़ैदियों से मिलता था जो विदेशी नागरिक घोषित करने के बाद जेल में बंद हैं."
वे बताते हैं, "उनकी तकलीफ़ सुनकर मैं अपना ग़म भूल गया. ऐसे लोग हैं जो 10 सालों से जेल में बंद हैं. अब उनसे कोई मिलने नहीं आता. घर-परिवार, बच्चे सब बर्बाद हो गए हैं. कुछ क़ैदियों को तो यह भी मालूम नहीं है कि आगे उनकी ज़िंदगी में क्या होगा. मुझसे सुझाव मांग रहे थे कि कैसे जेल से रिहा होंगे. अधिकतर क़ैदी न तो पढ़े लिखे हैं और न ही उनके पास कोर्ट में केस लड़ने के पैसे हैं."
हालांकि पिछले महीने, सुप्रीम कोर्ट ने असम में 'अवैध विदेशी' नागरिक के तौर पर डिटेंशन सेंटर में बंद लोगों को सशर्त रिहाई देने की अनुमति दी है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे बंदियों को जो तीन साल से अधिक समय तक डिटेंशन सेंटर में रह चुके हैं, उन्हें एक लाख रुपए के दो ज़मानती बॉन्ड प्रस्तुत करने के बाद रिहा किया जा सकता है.
ऐसे क़ैदियों को रिहाई के बाद अपने पूरे पते का विवरण जमा करना होगा और सुरक्षित डेटाबेस के लिए बायोमेट्रिक विवरण भी देना होगा. इसके साथ ही उन्हें हर हफ़्ते एक बार पुलिस स्टेशन को भी रिपोर्ट करना होगा.
जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, असम, मणिपुर, पंजाब, आंध्र प्रदेश और दिल्ली जैसी जगहों पर अपनी सेवाएं देने वाले सनाउल्लाह अगस्त 2017 में सेना की इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर कोर से रिटायर्ड हुए थे.
सनाउल्लाह अपनी भारतीय नागरिकता पर कहते है, "मैं 21 मई 1987 को फौज में भर्ती हुआ था. सेना में भर्ती के वक़्त सभी काग़ज़ातों की गहरी छानबीन की जाती है. मेरे पास पिता जी के नाम पर 1931 का खैराजी भूमि पट्टा था. पहले खैराजी पट्टा अस्थायी हुआ करता था लेकिन बाद में 1957 में ज़मीन का स्थायी पट्टा दिया गया. इसके अलावा 1966 की मतदाता सूची में मेरे पिता का नाम है. मेरे पास मैट्रिकुलेशन प्रमाण पत्र है. मैं विदेशी कैसे हो सकता हूं?"
अगर आपके पास नागरिकता से जुड़े सारे काग़जात हैं तो ट्राइब्यूनल को दिखाए क्यों नहीं?
इस सवाल का जवाब देते हुए सनाउल्लाह कहते हैं, "मुझे तो मालूम ही नहीं था कि मेरे ख़िलाफ़ 2008-09 में विदेशी होने का मामला दर्ज किया गया. मैं पिछले साल पहली बार ट्राइब्यूनल के समक्ष पेश हुआ था. अब इस पूरी जांच प्रक्रिया में किससे ग़लती हुई है उस बारे में अभी बात नहीं कर सकता. फ़िलहाल मेरा मामला हाई कोर्ट में है. मुझे कोर्ट पर पूरा भरोसा है और मैं जानता हूं मुझे अदालत से न्याय मिलेगा."
इस समय सनाउल्लाह के घर पड़ोसी से लेकर मीडिया के लोगों का आना-जाना लगा हुआ है. उनसे मिलने वाले लोग भी हैरानी जता रहें है कि 30 साल सेना में काम करने वाला व्यक्ति 'विदेशी नागरिक' कैसे बन गया.
मोहम्मद सनाउल्लाह सेना से रिटायर्ड होने के बाद 2017 में असम पुलिस की बॉर्डर ब्रांच में बतौर सब-इंस्पेक्टर नियुक्त हुए थे जिनका काम अवैध विदेशी नागरिकों की जांच करना था.
मोहम्मद सनाउल्लाह का परिवार उनकी रिहाई से थोड़ी राहत में ज़रूर है लेकिन वो आगे की क़ानूनी लड़ाई को लेकर परेशान भी है.
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