पुष्पा गिरिमाजी कहती हैं कि कंपनियों को इससे रोकने के लिए कोर्ट के आदेश के साथ-साथ लोगों की आपत्ति की भी जरूरत है.
वह कहती हैं, ''अगर लोग शोरूम में जाकर ये पूछना शुरू करेंगे कि वो कैरी बैग देते हैं या नहीं और इसी आधार पर शॉपिंग करेंगे तो कंपनियों पर असर जरूर पड़ेगा. हालांकि, कोर्ट के ऐसे फैसले भी काफी असर डालेंगे.''
वहीं, दिनेश प्रसाद रतुड़ी के मामले में बाटा कंपनी राज्य स्तर पर भी अपील कर सकती है. एडवोकेट दिनेश प्रसाद ने बताया, ''अगर कंपनी मामले को आगे ले जाती है तो हम भी लड़ेंगे. पर अभी उपभोक्ता फोरम के आदेश से हम खुश हैं.''
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राष्ट्रीय महिला आयोग, सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को एक नोटिस जारी किया है.
जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पुणे की दंपति की याचिका को स्वीकार करते हुए यह नोटिस जारी किया है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि "हम आपकी याचिका पर सबरीमला पर हमारे फ़ैसले की वजह से सुनवाई कर सकते हैं."
औरतों के मस्जिद में दाख़िल होने पर क़ुरान में कोई रोक नहीं बताई गई है.
शिया, बोहरा और खोजा मतों वाली मस्जिदों में औरतें आराम से दाख़िल होती हैं.
इस्लाम के सुन्नी मत को माननेवालों में से कई लोग, औरतों का मस्जिद में जाना ठीक नहीं समझते इसलिए सुन्नी मस्जिदों में औरतें नहीं जाती.
हालांकि दक्षिण भारत में कई सुन्नी मस्जिदों में औरतों का जाना आम है.
क़ुरान और अरबी भाषा की पढ़ाई अक्सर मस्जिदों में या मस्जिदों से लगे हुए मदरसों में ही होती है और इसमें लड़के-लड़कियां सभी शामिल होते हैं.
नमाज़ पढ़ने और वज़ू करने पर कोई रोक-टोक नहीं है. पर मर्द और औरतों के लिए इसकी जगह अलग-अलग बनाई गई हैं.
कई मस्जिदें मतों के मुताबिक़ नहीं होतीं, ऐसे में शिया-सुन्नी एक ही इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ते हैं.
अगर कोई औरत मस्जिद में नमाज़ पढ़ना चाहे तो इमाम से कह सकती है और इसके लिए उन्हें अलग जगह दे दी जाती है.
याचिकाकर्ताओं ने केरल के सबरीमाला मंदिर में औरतों को जाने की अनुमति देनेवाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है.
उन्होंने ये भी लिखा है कि मक्का में भी औरतें, मर्दों के साथ काबा की परिक्रमा करती हैं, ऐसे में मस्जिदों में उन्हें मर्दों से अलग हिस्से में रखना ग़लत है.
हालांकि मक्का की मस्जिद में भी नमाज़ पढ़ने और वज़ू करने के लिए मर्द और औरतों के लिए अलग हिस्से तय किए गए हैं.
ऐसा दुनिया की सभी मस्जिदों में किया जाता है.
याचिकाकर्ताओं ने इसे भारतीय संविधान के तहत तय किए गए मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया है.
वह कहती हैं, ''अगर लोग शोरूम में जाकर ये पूछना शुरू करेंगे कि वो कैरी बैग देते हैं या नहीं और इसी आधार पर शॉपिंग करेंगे तो कंपनियों पर असर जरूर पड़ेगा. हालांकि, कोर्ट के ऐसे फैसले भी काफी असर डालेंगे.''
वहीं, दिनेश प्रसाद रतुड़ी के मामले में बाटा कंपनी राज्य स्तर पर भी अपील कर सकती है. एडवोकेट दिनेश प्रसाद ने बताया, ''अगर कंपनी मामले को आगे ले जाती है तो हम भी लड़ेंगे. पर अभी उपभोक्ता फोरम के आदेश से हम खुश हैं.''
सुप्रीम कोर्ट में एक मुस्लिम दंपत्ति
ने एक याचिका दाख़िल कर अपील की है कि मस्जिदों में औरतों के दाख़िल होने,
एक ही जगह पर मर्दों के साथ नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया जाए.
पुणे के इस दंपति के मुताबिक़ उन्हें एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से रोका गया था जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी.इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राष्ट्रीय महिला आयोग, सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को एक नोटिस जारी किया है.
जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पुणे की दंपति की याचिका को स्वीकार करते हुए यह नोटिस जारी किया है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि "हम आपकी याचिका पर सबरीमला पर हमारे फ़ैसले की वजह से सुनवाई कर सकते हैं."
औरतों के मस्जिद में दाख़िल होने पर क़ुरान में कोई रोक नहीं बताई गई है.
शिया, बोहरा और खोजा मतों वाली मस्जिदों में औरतें आराम से दाख़िल होती हैं.
इस्लाम के सुन्नी मत को माननेवालों में से कई लोग, औरतों का मस्जिद में जाना ठीक नहीं समझते इसलिए सुन्नी मस्जिदों में औरतें नहीं जाती.
हालांकि दक्षिण भारत में कई सुन्नी मस्जिदों में औरतों का जाना आम है.
क़ुरान और अरबी भाषा की पढ़ाई अक्सर मस्जिदों में या मस्जिदों से लगे हुए मदरसों में ही होती है और इसमें लड़के-लड़कियां सभी शामिल होते हैं.
नमाज़ पढ़ने और वज़ू करने पर कोई रोक-टोक नहीं है. पर मर्द और औरतों के लिए इसकी जगह अलग-अलग बनाई गई हैं.
कई मस्जिदें मतों के मुताबिक़ नहीं होतीं, ऐसे में शिया-सुन्नी एक ही इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ते हैं.
अगर कोई औरत मस्जिद में नमाज़ पढ़ना चाहे तो इमाम से कह सकती है और इसके लिए उन्हें अलग जगह दे दी जाती है.
याचिकाकर्ताओं ने केरल के सबरीमाला मंदिर में औरतों को जाने की अनुमति देनेवाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है.
उन्होंने ये भी लिखा है कि मक्का में भी औरतें, मर्दों के साथ काबा की परिक्रमा करती हैं, ऐसे में मस्जिदों में उन्हें मर्दों से अलग हिस्से में रखना ग़लत है.
हालांकि मक्का की मस्जिद में भी नमाज़ पढ़ने और वज़ू करने के लिए मर्द और औरतों के लिए अलग हिस्से तय किए गए हैं.
ऐसा दुनिया की सभी मस्जिदों में किया जाता है.
याचिकाकर्ताओं ने इसे भारतीय संविधान के तहत तय किए गए मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया है.
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